Tag: मुस्लिम

  • साइंस ने इल्म ए ग़ैब कैसे बता दिया?

    साइंस ने इल्म ए ग़ैब कैसे बता दिया?

    जवाब:-निःसंदेह, अल्लाह ही के पास है प्रलय का ज्ञान, वही उतारता है वर्षा और जानता है जो कुछ गर्भाशयों में है और नहीं जानता कोई प्राणी कि कल वह क्या कमायेगा और नहीं जानता कोई प्राणी कि किस धरती में मरेगा। वास्तव में, अल्लाह ही सब कुछ जानने वाला, सबसे सूचित है।

    (सुरः लुक़मान आयत 34)

     

    बेशक अल्लाह ही सभी ज़ाहिर और छुपी बातों को जानने वाला है। तमाम इल्म उसी का है। उसके इल्म से किसी के इल्म की तुलना नहीं की जा सकती क्योंकि जिसको जितना भी ज्ञान है वह अल्लाह का अता किया हुआ ही है और अल्लाह के मुकाबले में कुछ भी नहीं है।

     

    मिसाल के तौर पर कुछ सदियों पहले तक इंसान को तो इस दुनियाँ के सुदूर इलाको के बारे में ही नहीं पता था, फिर अल्लाह के दिये हुए इल्म और सोचने समझने और नई चीज़ ईजाद करने की शक्ति का इस्तेमाल किया।

     

    जिस के बारे में ख़ुद अल्लाह ने क़ुरआन में इंसानो को प्रेरित किया है

     

    ..वास्तव में, इसमें बहुत-सी निशानियाँ हैं, उनके लिए, जो सोच-विचार करें।

    (क़ुरआन 45:13)

     

    और इसी सोच विचार करने की शक्ति और अल्लाह के दिये इल्म का इस्तेमाल कर हमने दुनियाँ के बारे में जाना और उस से आगे बढ़ते हुए आज के दौर में हम इस सौर मंडल के कुछ ग्रहों के बारे में थोड़ा कुछ मालूमात कर पाए हैं। लेकिन यदि हम अपनी इस मालूमात की तुलना सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड और उसमें मौजूद अनगिनत ग्रह आदि के ज्ञान से करें तो हमारा आज का ज्ञान भी कुछ नहीं है।

     

    जबकि दूसरी तरफ़ अल्लाह ने तो इस सम्पूर्ण कायनात को बनाया इस ब्रह्माण्ड के परे और क्या-क्या है कितनी सजीव, निर्जीव रचनाएँ हैं उन सब को बनाया और वह इसके कण-कण का ज्ञान रखता है।

     

    ऐसा नहीं है कि इंसान कुछ जानता ही नहीं है। लेकिन इंसान के जानने और अल्लाह का जानने में बहुत फ़र्क़ है। जहाँ अल्लाह का किसी के भी बारे में जानना (पता होना) कुल का कुल (पूरा का पूरा है) है, असीम है, सम्पूर्ण है। वहीं इंसान का जानना आंशिक है, अनिश्चित है।

     

    इस तरह उपर्युक्त आयात में फ़रमाया “अल्लाह जानता है जो कुछ गर्भाशयों में है”

     

    अर्थात अल्लाह संपूर्ण बातें जानता है जो कुछ गर्भाशय में है उसके बारे में उसे तमाम मालूमात है फिर चाहे वह होने वाले शिशु का लिंग हो, उसका रंग रूप हो, जीवित अवस्था में जन्म लेगा या गर्भपात होगा, किस दिन, किस क्षण पैदा होगा उसके कर्म कैसे होंगे, उसकी आयु कितनी होगी, उसके गुण क्या होंगे, कुल का नाश करेगा या उद्धार करेगा, कहाँ रहेगा कहाँ मृत्यु को प्राप्त होगा यहाँ तक जीवन से लेकर जीवन उपरांत तक सभी बातों का कुल का कुल ज्ञान अल्लाह को है और वह यह सब कुछ जानता है।

     

    अब यहाँ हम अगर इसकी तुलना इंसानों के जानने और उनकी मालूमात से करें तो आज के दौर में भी डॉक्टर ज़्यादा से ज़्यादा भ्रूण का लिंग पता कर सकते हैं या थोड़ा और कुछ वह भी जो गर्भावस्था का एक अंतराल गुज़र जाने के बाद, उसमें भी उन्हें कई चीज़ों का सहारा लेना पड़ता है, इसके बाद भी कई बार गलती का इम्कान (संभावना) होता है। इस विषय में जानने के लिए अनगिनत बातें और भी हैं जैसे कुछ ऊपर बताई गई आयु, गुण, कर्म, जीवन, मरण इत्यादि।

     

    दरअसल ऊपर बताई मिसाल की तरह पहले तो इंसान को गर्भ के बारे में कुछ इल्म ही नहीं था, अब जाकर अल्लाह के दिये इल्म का इस्तेमाल कर वह थोड़ा कुछ जानने में समर्थ हुआ है लेकिन उसका इस बारे में भी जानना आज भी अल्लाह के जानने के मुकाबले में शून्य ही है और हमेशा शून्य रहेगा।

     

    वास्तव में अल्लाह ही है जो यह सब जानता है और वे बातें भी जो गर्भाशय में है और हमारे इल्म से बाहर हैं या जिस तरफ़ अभी हमारा ध्यान ही नहीं हो। उसके अलावा कोई और यह सब जानने की कल्पना करना तो दूर इसमें कितने विषय और बातें हैं जानने के लिए, इस बात की गणना भी नहीं कर सकता।

     

    और उसी (अल्लाह) के पास ग़ैब (परोक्ष) की कुंजियाँ हैं। उन्हें केवल वही जानता है तथा जो कुछ थल और जल में है, वह सबका ज्ञान रखता है और कोई पत्ता नहीं गिरता परन्तु उसे वह जानता है और न कोई अन्न, जो धरती के अंधेरों में हो और न कोई आर्द्र (भीगा) और न कोई शुष्क (सूखा) है, परन्तु वह एक खुली पुस्तक में है।

    (क़ुरआन 6:59)

  • फिलिस्तीन और इज़राइल के विवाद का क्या कारण है ?

    फिलिस्तीन और इज़राइल के विवाद का क्या कारण है ?

    बात 1492 की है, जब स्पेन से यहूदियों को मार कर भगाया जा रहा था तब *तुर्क साम्राज्य, सल्तनत ऐ उस्मानिया (Ottoman Empire) के सुल्तान बायज़ीद ने स्पेन के तट पर अपने जहाज़ खड़े कर दिए और लाखों यहूदियों को अरब से तुर्की तक फैली अपनी सल्तनत में पनाह दी।
     
    दूसरी बार फिर जब 1943 में जर्मनी में हिटलर के होलोकॉस्ट (नरसंहार) से निष्कासित किए गए लाखों यहूदी शरणार्थियों से ठसाठस भरे हुए जहाज़ समुद्र को चीरते हुए इटली, फ्रांस, ब्रिटेन, अमेरिका में पनाह मांगने पहुचे लेकिन हर जगह से नाउम्मीद होने पर एक बार फिर जहाजों पर बैनर लगा कर फिलिस्तीन से गुहार की।
     
    “जर्मन ने हमारे घर, परिवार को तबाह कर दिया है आप हमारी उम्मीदों को मत कुचलना” और 1400 सालों से बसे फिलिस्तीनियों ने अपनी ज़मीन पर यहूदियों को जगह दी।
     
    जिस बारे में ख़ुद यहूदी प्राइम मिनिस्टर डेविड बेन-गुरियन (David Ben-Gurion) ने अपनी किताब में लिखा है की 70ई. से 1917 तक जो Diaspora (यहूदियों की प्रताड़ना / बिखराव ) का समय था, जिसमें ईसाईयों की गुलामी / प्रताड़ना से मुस्लिमो ने हमे बचाया और स्पेन की मुस्लिम हुक़ूमत हमारे लिए स्वर्ण काल (Golden Period) था।
     
    इन सब के बावजूद आज इज़राइली लोग फिलिस्तीनियों की जान के दुश्मन बने हैं और उनके ग़लत चित्रण में कोई कमी नहीं छोड़ रहे।
     
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    फिलिस्तीन (अरब-मुस्लिम) और इजराइल (यहूदियों) के विवाद का मुख्य कारण क्या है?
     
    इसका मुख्य कारण है फिलिस्तीनियों को बेघर कर उनकी ज़मीन पर क़ब्ज़ा करना। जो कि उन्होंने लगभग कर भी लिया है। 1948 के पहले आज का इज़राइल कोई देश ही नहीं था उक्त भूमि सिर्फ़ फिलिस्तीन थी जिस पर यहूदियों को बसाया गया जिन्होंने लगातार विस्तार और दमन कर आज पूरे फिलिस्तीन पर कब्ज़ा कर लिया है और अब थोड़े ही हिस्से में मूल निवासी फिलिस्तीनी बचे हुए हैं जिन्हें भी निष्कासित करने की कोशिश हर वक़्त इज़राइल करता रहता है
     
    यह तथ्य इतना स्पष्ट तथ्य है कि इस बारे में हर कोई जानता है कि इज़राइल कब बना।
     
    अब इस बारे में थोड़ा और विस्तार से जानते हैं।
     
    ▪️ प्रथम विश्व युद्ध (1st World war) के बाद जब वैश्विक हुक़ूमत बदलने लगी तब यहूदियों को अहसास हो गया था, की अब ख़ुद का देश होना ज़रूरी है। द्वितीय विश्व युद्ध (Second world war) से पहले जब यूरोप और दूसरी जगह से जब यहूदियों को भगाया जाने लगा तब से वह अपने लिए ज़मीन की तलाश में थे जो की फिलिस्तीन में जाकर पूरी हुई। लेकिन फिलिस्तीन में 1400 सालों से रह रहे अरब मुस्लिमो को वहाँ से हटाए बिना यह सम्भव नहीं था। 1948, 1956, 1967, 1980, 1994, 2006, 2008, 2014 और अब 2021 में लगातार फिलिस्तीनियों को उनकी जगह से खदेड़ कर यहूदियों की बस्ती बसाई जा रही है। 1941 में 20% पर फिलिस्तीनी ज़मीन पर यहूदी थे जो आज 95% ज़मीन पर कब्जा कर चुके है और वहाँ के मज़लूमो ने जब कभी इसके खिलाफ संघर्ष किया तो मुस्लिम विरोधियों ने उन्हें ही आतंकी घोषित कर दिया गया।
     
    ▪️ 1906 में विश्व ज़ायोनी संगठन World Zionist Organization (WZO) ने अर्जेंटीना को *Zionist (यहूदी) मातृभूमि बनाने को लेकर चर्चा की। लेकिन 1917 में ब्रिटेन के विदेश सचिव लॉर्ड बेलफोर और यहूदी (Zionist) नेता लॉर्ड रोथ्सचाइल्ड के बीच एक पत्र व्यवहार हुआ जिसमे लॉर्ड बेलफोर ने ब्रिटेन की ओर से ये आश्वासन दिया की अर्जेंटीना के बजाए फिलिस्तीन को यहूदियों की मातृभूमि के रूप में बनाने के लिए वह पूरी कोशिश करेंगे।
     
    ▪️ प्रथम विश्व युद्ध के बाद उस्मानिया खिलाफत (Ottoman Empire) को ख़त्म करने के लिए ब्रिटेन और फ्रांस ने एक गुप्त समझौता किया जिसे *साइक्स-पिकोट समझौता (Sykes-Picot Agreement) भी कहते है। इसके अंतर्गत पूरे अरब जगत को दो “क्षेत्रों” में बाँट दिया गया जिसमे रूस की भी स्वीकृति थी। इसके अंतर्गत सीरिया और लेबनान फ्रांस के प्रभाव क्षेत्र मे और जॉर्डन, इराक और फिलिस्तीन ब्रिटेन के क्षेत्र में और फिलिस्तीन का कुछ क्षेत्र मित्र देशों की संयुक्त सरकार के क्षेत्र में आ गया। रूस को इस्तांबुल, तुर्की और अर्मेनिया का कुछ इलाक़ा मिल गया।
     
    ▪️ प्रथम विश्व युद्ध (1st World War) के बाद फिलिस्तीन, तुर्की (उस्मानिया खिलाफत) से ब्रिटिश हुक़ूमत में चला गया। 1922 में मित्र देशों का ब्रिटेन को समर्थन था। ब्रिटिश फिलिस्तीन में एक स्थानीय और स्वशासनीय सरकार का प्रबंध चाहते थे मगर यहूदी ऐसे किसी भी स्वशासनीय सरकार के प्रबंध से डरे हुए थे क्योंकि इसमे जनसंख्या के अनुपात से अरबों की बहुलता हो जाती। जैसा कि शुरू में बताया गया कि 1492 में उस्मानिया खिलाफत में जब यहूदियों को सहारा दिया था तब से कुछ यहुदी उस क्षेत्र में रह रहे थे। प्रथम विश्व युद्ध (1st world war) तक फिलिस्तीन में 6 लाख फिलिस्तीनी और 1 लाख यहूदी रहते थे।
     
    ▪️ 1932 से 1943 तक लाखों यहूदी जर्मनी, पोलैंड और पूर्वी यूरोप से भागकर अपनी जान बचा कर फिलिस्तीन आने लगे। फिलिस्तीन में यहूदियों की बढ़ती आबादी से यहूदी (Zionist) ब्रिटेन पर दबाव बनाने लगे की उसको एक राष्ट्र घोषित करें। इधर फिलिस्तीनियों को चिंता होने लगी की यहूदियों की बढ़ती आबादी से उनको अपनी ज़मीन छोड़नी होगी। इस बढ़ते दबाव से ब्रिटेन अलग हो गया और उसमे इजराइल और फिलिस्तीन विवाद संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) को दे दिया।
     
    ▪️ संयुक्त राष्ट्र ने अरब और यहूदियों का फिलिस्तीन में टकराव देखते हुए फिलिस्तीन को दो हिस्सों अरब राज्य और यहूदी राज्य (इजराइल) में विभाजित कर दिया। संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) ने एक योजना बनाई जिसमे 45% जमीन 70% फिलिस्तीनियों को और 55% जमीन 30% यहूदियों को देने की बात करी। इस अन्याय पूर्ण प्लान का फिलिस्तीनियों ने विरोध किया जिससे *14 मई 1948 को इजराइल ने ख़ुद स्वतन्त्रता की घोषणा कर दी और इजराइल को एक स्वतंत्र राष्ट्र घोषित कर दिया।
     
    जिसके कारण पहला अरब और इजराइल युद्ध हुआ। जिसमे लाखों फिलिस्तीनी बेघर हुए और इजराइल (Israel) ने फिलिस्तीन के 78% हिस्से कब्जा कर लिया। गाज़ा और ईस्ट येरूशलम जॉर्डन के कंट्रोल में गया और इजराइल ने 11 मई 1949 में संयुक्त राष्ट्र की मान्यता हासिल की। (इस युद्ध में अक्सर हम सुनते है, की एक अकेले इजराइल ने अरब लीग जिसमे 8 देश थे को हराया, जबकि सच्चाई ये है  कि  इजराइल को मित्र राष्ट्रों का पूरा समर्थन था क्योंकि इजराइल फिलिस्तीन में बसना शुरू ही हुए थे तथा इजराइल के समर्थन में 117500 और अरब के साथ मात्र 63 हज़ार फ़ौज थी)
     
    ▪️ 1956 में दूसरा अरब इजराइल युद्ध हुआ और इजराइल ने पूर्वी येरुशलम पर भी अपना क़ब्ज़ा कर लिया और एक समझौता हुए जिसमे मस्जिद ऐ अक़्सा का क़ब्ज़ा जॉर्डन को दिया गया।
     
    यहूदियों के धार्मिक कानून और इजराइल सरकार (Government) के अनुसार यहूदी, उस 35 एकड़ के क्षेत्र जिसमे मस्जिद ऐ अक़्सा और डोम ऑफ द रॉक (Dome of the rock) है के अंदर नहीं जा सकते है क्योंकि वह उनके लिए बहुत ही पवित्र है और वह उसमे पैर नहीं रख सकते है। जिस बारे में 1967 में इजराइल के डिफेंस मिनिस्टर मोशे दयान ने कहा था कि यही सही है की मस्जिद ऐ अक़्सा की देख रेख जॉर्डन ही करें। लेकिन समय के साथ अपने अक़ीदे को खुद तोड़ दिया और सन् 2000 में 1000 पुलिस के साथ उग्रवादी यहूदी (Zionist) ज़बरदस्ती उस क्षेत्र में घुसे है और दमन करने लगे। जिससे दोनों पक्षों के लोग घायल हुए और मारे गए।
     
    ▪️ 1980 आते-आते जॉर्डन पीछे हटा और फिलिस्तीन लीडरशिप आगे आई और सत्ता हाथ में ली। लेकिन पूर्वी येरुशलम वापस नहीं मिला और वह यहूदियों के क़ब्ज़े में ही रहा 1994 तक मस्जिद ऐ अक़्सा के ग्रैंड मुफ्ती की नियुक्ति (Appointment) जॉर्डन करता था जो की फिलिस्तीनी होते थे। इस 35 एकड़ की जगह को अब तक जॉर्डन ही मरम्मत करता आ रहा है जिसमे तीनों धर्म (यहूदी / ईसाई / मुस्लिम) की निशान मौजूद है। इस पर अब तक 1 बिलियन डॉलर ख़र्च कर चूका है और इस क्षेत्र की सुरक्षा (Security) इजराइल के पास है जो फिलिस्तीनियों को अंदर आने में परेशानी पैदा करती है।
     
    ▪️ 1980 में इजराइल ने एक कानून पास किया और येरुशलम को एक पूर्ण इजराइल स्टेट की टेरिटरी ख़ुद ही बना दिया। जो अंतरराष्ट्रीय कानून (International law) का उल्लंघन है जिसे कोई भी देश मान्यता नहीं देता है। 06 दिसंबर 2017 में ट्रम्प सरकार येरुशलम, जो की फिलिस्तीन की राजधानी थी को इसराइल की राजधानी की मान्यता दे देती है। जगजाहिर है कि इज़राइल और अमेरिका का हमेशा से गठजोड़ रहा है जिसकी प्रमुख वज़ह अमेरिका के अहम ओहदों पर यहूदियों के कब्ज़ा और इकोनॉमी पर पकड़ है।
     
    इस पूरी लड़ाई का कारण ब्रिटेन, अमेरिका, फ़्राँस और रूस के समर्थन में इजराइल द्वारा फिलिस्तीन पर अवैध क़ब्ज़ा है जो की मस्ज़िद ऐ अक़्सा को गिरा कर पूरे फिलिस्तीन से मुस्लिमो को भगा कर ग्रेटर इज़राइल (Greater Israel) की स्थापना करना चाहते हैं जो कि यहूदियों के धर्म ग्रँथों से प्रेरित है, जिसका निर्माण करने से उनका मानना है कि उनका अंतिम मसीहा दुनिया में आगमन करेगा और वे उसके सान्निध्य में विश्व पर राज करेंगे। इस बारे में जानने के लिए यहूदी ग्रँथों *Greater Israel ,Third temple, New World Order, Freemason, Illuminati*  ( ग्रेटर इज़राइल, थर्ड टेम्पल , न्यू वर्ल्ड आर्डर   फ्रीमेसन, इल्लुमिनेटी)  और रोथ्सचाइल्ड परिवार (Rothschild Family) के बारे में पढ़ना चाहिए ।
  • क्या इस्लाम में ऊँच-नीच भेदभाव है?

    क्या इस्लाम में ऊँच-नीच भेदभाव है?

    जवाब:- इस्लाम में रंग, जात-पात, नस्ल आदि के नाम पर किसी भी तरह के भेदभाव की कोई जगह नहीं है। अल्लाह की नज़र में सभी मनुष्य इस आधार पर एक समान हैं।

     

    क़ुरआन में अल्लाह तआला फरमाते हैं: “ऐ लोगो! हमने तुम्हें एक पुरुष और एक स्त्री से पैदा किया और तुम्हें बिरादरियों और क़बीलों का रूप दिया, ताकि तुम एक-दूसरे को पहचानो। वास्तव में अल्लाह के यहाँ तुम में सबसे अधिक प्रतिष्ठित वह है, जो तुम में सबसे अधिक डर रखता है। निश्चय ही अल्लाह सब कुछ जानने वाला, ख़बर रखने वाला है।

    (क़ुरआन 49:13)

     

    पैगम्बर मुहम्मद (सल्लल्लाहो अलैही व सल्लम) ने अपने आखरी हज के मौके पर फ़रमाया: किसी अरब वाले को दूसरे मुल्क वाले पर और ना दूसरे मुल्क वालों को अरबों पर कोई फजीलत और बरतरी (महत्व / विशेष अधिकार) है इसी तरह किसी गोरे को काले पर और काले को गोरे पर कोई फजीलत नहीं है, फजीलत सिर्फ़ तक्वा यानी अल्लाह से डरने की वज़ह से है

     

    इस से हमे मालूम हुआ कि इस्लाम में नस्ल, वतन ,रंग, बिरादरी को कोई अहमियत (महत्व) नहीं है, यह सिर्फ़ इसलिए बनाई गई है कि लोग एक दूसरे को पहचान सकें जैसे रंग-रूप, बोल-चाल देख कर पहचाना जा सकता है कि यह व्यक्ति किस जगह का है, किस जगह से ताल्लुक रखता है। लेकिन यह चीज़ किसी को छोटा या बड़ा नहीं बनाती बल्कि अल्लाह के नज़दीक जो चीज़ किसी का दर्जा बढ़ाती है और किसी को दूसरे से बेहतर बनाती है तो वह है “तक्वा” यानी कि अल्लाह से डर, धर्म-परायणता।

     

    इस्लाम की विशेषता यह है कि यह सिर्फ़ उपदेश, कहने भर पर नहीं रुकता बल्कि इस से आगे बढ़कर इस पर अमल (अभ्यास) करवा कर आदर्श स्थापित करवाता है।

     

    जैसे दिन में पांच वक़्त नमाज़ का हुक्म अल्लाह ने दिया जिसमें सभी को एक सफ़ (लाइन) में कंधे से कंधा मिलाकर नमाज़ अदा करनी होती है। फिर चाहे कोई अमीर हो या ग़रीब, किसी बिरादरी का हो, मालिक हो या कर्मचारी, बादशाह हो या ग़ुलाम किसी तरह का भेदभाव नहीं रह जाता और हज के मौके पर यही चीज़ आलमी (वैश्विक) तौर पर देखने को मिलती है कि एक जैसे से कपड़े में काले, गोरे चाहे किसी मुल्क के हो सब कंधे से कंधा मिलाकर खड़े होते हैं और साफ़ जाहिर होता है कि अल्लाह के सामने सब बराबर हैं। इस्लाम के कई और अर्कानो (Devotional duties of Islam / इस्लाम के भक्ति संबंधी कर्तव्य) में इस तरह की मिसाल देखी जा सकती है।

     

    स्पष्ट हुआ कि इस्लाम में जात-पात का कोई आधार नहीं है ना किसी बिरादरी की किसी दूसरे पर श्रेष्ठता है। सय्यदों के मामले में यह अवश्य है कि हज़रत मोहम्मद (स.अ.व.) के रिश्तेदार होने के नाते सभी मुस्लिमो द्वारा उन्हें विशेष सम्मान और प्रेम प्राप्त है लेकिन यह भी उन्हें किसी तरह की क़ानूनन या व्यवहारिक विशेषता प्रदान नहीं करता।

    और इस बात के अनेक उदाहरण मौजूद हैं कि पैगम्बर ऐ इंसानियत हज़रत मुहम्मद (स.अ.व.) से ही कई सय्यद कानूनी मामलों में अदालत में सामान्य व्यक्ति के रूप में पेश होते आएँ हैं, दूसरे मुस्लिमो में विवाह / रिश्ते आदि करते आएँ हैं और कई सय्यद मौजूद होने पर भी किसी गैर सय्यद को तक़वे और काबिलियत के आधार पर अमीर (सरदार) नियुक्त किया जाता रहा है।

     

    क्या मुसलमानों को सिर्फ़ अपनी बिरादरी / जाति / समाज में शादी करने का हुक्म है?

     ऐसा बिल्कुल नहीं है, क़ुरान में जिन रिश्तों (खूनी रिश्तों) में शादी करना मना है उसके अलावा एक मुस्लिम दुनिया के किसी भी मुल्क, नस्ल, बिरादरी से ताल्लुक रखने वाले मुस्लिम से शादी कर सकता है इसमें किसी तरह की बंदिश नहीं है।

    इसे इस्लाम ने व्यक्ति की अपनी पसंद (Choice) पर छोड़ दिया है। फिर चाहे वह अपनी आपसी रिश्तेदारों में करे या बाहर करे । कई लोग आपस में सिर्फ़ इसलिये रिश्ते करते हैं क्योंकि लोग जाने पहचाने होते हैं अतः निबाह की संभावना काफ़ी अधिक होती है। इस्लाम इसे भी मना नहीं करता ।

    हाँ इस बात की सलाह अवश्य देता है कि अपनी बच्चों का रिश्ता सोच-समझकर और हर चीज़ पर विचार करके करे ताकि आगे कोई समस्या ना आए और वे एक अच्छा वैवाहिक जीवन व्यतीत करें ।

    लेकिन कोई व्यक्ति अगर सिर्फ़ इन चीज़ों (नस्ल, बिरादरी) के आधार पर अपने को दूसरों से श्रेष्ठ समझे अपनी बिरादरी से बाहर रिश्ता करना हराम / पाप समझे और इस वज़ह से बाहर रिश्ता ना करे तो यह बिल्कुल ग़लत बात है और वह अल्लाह की हलाल की हुई शय (चीज़) को हराम क़रार कर बहुत बड़ा गुनाह कर रहा है।

    अंत में सवाल आता है कि इतना प्रावधान होने के बाद भी कुछ मुसलमान जाति के नाम पर भेदभाव क्यों करते हैं?

    इसकी सीधी-सी वज़ह इस्लामिक ज्ञान ना होना और इस्लाम की शिक्षा से दूरी होना है। जब कोई व्यक्ति इन चीज़ों से दूर होता है तो समाज में व्याप्त बुराइयों में वह भी लिप्त हो जाता है और फिर उन बुराइयों को अपना लेता है, जिनको उसने या उसके पूर्वजों ने इस्लाम अपनाने पर त्याग कर दिया था।

    जैसा भारत में इस्लाम के आने से पहले ही जातिवाद, ऊँच नीच और एक ही ख़ानदान में शादी की रीत चली आ रही है तो किसी दूसरे मुल्कों में काले गोरे के भेदभाव का इतिहास रहा। ऐसी और भी कई सामाजिक बुराइयाँ हैं जिनकी इस्लाम में कोई जगह नहीं, पर कई मुस्लिमों ने उसको आत्मसात कर लिया है जिसका कारण ऊपर बताई गई बात है जो कि इस्लाम की नहीं बल्कि उनकी ख़ुद की और समाज, सोसाइटी (मआशरे) की ग़लती है। जिसका उन्हें त्याग करना चाहिए और इस्लाम की शिक्षाओं पर अमल करना चाहिए।

  • अल्लाह ने सभी को मुस्लिम क्यों नहीं बनाया ?

    अल्लाह ने सभी को मुस्लिम क्यों नहीं बनाया ?

    जवाब:- हदीस में आता है कि तमाम इंसान मुसलमान ही पैदा होते है फिर उनके माँ बाप उन्हें यहूदी, मजूसी बनाते हैं।
     
    यानी अल्लाह को “एक मानना और इस्लाम” इंसान की फ़ितरत है जो कि माँ-बाप के अक़ीदे के प्रभाव से बदल जाती है।
     
    अब सवाल यह होता है के फिर अल्लाह ने सभी को मुस्लिम माँ-बाप के यहाँ क्यो पैदा नहीं किया? या जबरिया मुस्लिम क्यो नहीं बनाया?
     
    तो बेशक अगर अल्लाह चाहता तो सभी को मुस्लिम और फरमाबरदार बना सकता था। लेकिन अल्लाह को किसी तरह की ज़बरदस्ती नहीं करना थी।
     
    …यदि अल्लाह चाहता, तो तुम्हें एक ही समुदाय बना देता, परन्तु उसने जो कुछ दिया है, उसमें तुम्हारी परीक्षा लेना चाहता है।… (क़ुरआन 5:48) 
     
    चूंकि यह दुनिया सभी के लिए इम्तिहान है और परीक्षा की जगह है तो अगर सब को ज़बरदस्ती फरमाबरदार बना दिया जाता तो फिर परीक्षा का मतलब ही क्या रह जाता?
     
    जिसने उत्पन्न किया है मृत्यु तथा जीवन को, ताकि तुम्हारी परीक्षा ले कि तुममें किसका कर्म अधिक अच्छा है? तथा वह प्रभुत्वशाली, अति क्षमावान् है। (क़ुरआन 67:2) 
     
    साथ ही यह बात ग़ौर करने की है कि मुसलमान घर में पैदा होना या पैदाइश से मुसलमान होना इस बात की गारंटी नहीं है कि वह व्यक्ति जन्नत में जायेगा। बल्कि एक व्यक्ति मुस्लिम घर में पैदा हो कर भी अंत में जहन्नम को नसीब हो सकता है तो वही एक व्यक्ति भले गैर मुस्लिम पैदा हुआ हो वह अल्लाह के बताए हुए आदेश पर पालन कर जन्नत में जा सकता है।
     
    दरअसल इस दुनिया में सभी अपनी-अपनी परीक्षा दे रहे हैं सभी को अपना हिसाब देना है। फिर चाहे वह अमीर हो गरीब हो, मुस्लिम हो या गैर मुस्लिम हो।
     
    इसको हम आज आसानी से इस तरह समझ सकते है जैसे आजकल बोर्ड परीक्षा में प्रश्न पत्र (Question paper) सेट में आते हैं। हर सेट में सवाल अलग होते हैं किसी को A सेट मिलता है किसी को B सेट मिलता है। बहरहाल सभी को अलग-अलग सवाल मिलते हैं। सभी सेटों में कुछ सवाल सरल होते हैं तो कुछ मुश्किल भी होते है और मुश्किल सवालों के नम्बर भी अधिक होते हैं।
     
    ऐसे ही हम सभी को अलग-अलग तरह की ज़िंदगी और परिस्थिति मिली है जिसमे हमे परीक्षा देना है। किसी के लिए कुछ मामलों में आसानी है तो किसी दूसरे मामले में मुश्किल और जितनी बड़ी मुश्किल उतना बड़ा बदला भी है।
     
    ऐसे ही हम जब उन लोगों की बात करे जो मुस्लिम पैदा हुए तो उनके लिए आसानी यह है कि उन्हें इस्लाम कबूल करने में मशक्कत नहीं करना पड़ी बल्कि माँ बाप के ज़रिए आसानी से मिल गया। लेकिन परेशानी यह है कि जिस को जो चीज़ जितनी आसानी से मिलती है उसकी उतनी कम क़द्र करता है। यही वज़ह है कि कई मुस्लिम इस्लाम के बुनियादी अमल ही पूरे नहीं करते और हो सकता है कि वह इस दुनिया रूपी परीक्षा में फैल हो जाये।
     
    जबकि जो मुस्लिम घर में पैदा नहीं होते उन्हे भले इस्लाम कबुल करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता हो लेकिन चूंकि उन्हें इसकी अहमियत पता होती है वे मुस्लिम होने पर इस्लाम के पालन में कोताही नहीं करते और सफलता प्राप्त करते हैं।
     
    ऐसे ही यह भी है कि पैदाइश से मुसलमानों को अपना हिसाब किताब बालिग होने की उम्र से ही देना है यानी कितनी नमाज़ अदा की, कितने रोज़े छोड़े वगैरह। जबकि जो मुस्लिम घरों में पैदा नहीं हुए उनके इस्लाम से पहले की ज़िंदगी के सभी अमल और गुनाह माफ़ होते है और हिसाब उसी दिन के बाद से देना होता हैं जिस दिन वे इस्लाम अपनाते है।
     
    ऐसी और भी कई बातें है। जिस से पता लग जाता है कि दोनों ही सूरत बहरहाल बराबर है और यह सिर्फ़ और सिर्फ़ व्यक्ति पर है कि वह कैसा अनुसरण करता है और इस परीक्षा में पास होता है या असफल होता है। इसमें उसके मुस्लिम और गैर मुस्लिम घर में पैदा होने से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।
     
    क्योंकि अल्लाह सिर्फ़ एक है और उसकी ही इबादत करना चाहिए और उसके आदेशो का पालन करना चाहिए यह बात अल्लाह तआला जीवन में कभी ना कभी हर व्यक्ति के दिल में डाल ही देता है। परन्तु इसके बाद भी इंसान उसे दूसरे प्रभावों में दबा देता है या उसको क़बूल करने का साहस नहीं दिखता और उसका ज़िम्मेदार वह ख़ुद ही होता है चाहे फिर वह मुस्लिम हो या गैर मुस्लिम।
     
    जैसा कि फ़रमाया क़ुरान में:-
     
    हम शीघ्र ही दिखा देंगे उन्हें अपनी निशानियाँ संसार के किनारों में तथा स्वयं उनके भीतर। यहाँ तक कि खुल जायेगी उनके लिए ये बात कि यही सच है और क्या ये बात पर्याप्त नहीं कि आपका पालनहार ही प्रत्येक वस्तु का साक्षी (गवाह) है?
    (क़ुरआन 41:53)
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