सवाल:- सुधांशु त्रिवेदी इस विडियो में कह रहे हैं की जहाँ दूसरे अल्पसंख्यकों ने तरक्की की वहीं मुस्लिम आरक्षण के बाद भी पीछे रह गए। आज़ादी के समय सिर्फ मुस्लिमों की कई रियासतें थी और आज उनकी आर्थिक स्थिति सब से खराब है और यह वर्ग पीछे होता ही गया। इसके पीछे कारण है सेक्युलर पार्टियां।

जवाब:-  श्री सुधांशु जी ने बिल्कुल सही फ़रमाया देश में मुस्लिमों की स्थिति दिन-ब-दिन ही खराब होती चली गई और इसके पीछे राजनीतिक पार्टियाँ और वोट बैंक की राजनीति ही रही।

यह बात भी सही है कि तथाकथित पार्टियों ने मुस्लिमों में, सुधांशु जी की पार्टी के प्रति असुरक्षा और डर का माहौल बना कर ध्रुवीकरण करने की कोशिश की। लेकिन अगर वे ऐसा करने में कामयाब हुईं हैं तो इसकी प्रमुख वज़ह आप ही की पार्टी बनी है। यदि आप उदार होते और धर्म की राजनीति के पैरोकार ना होते। यदि मुस्लिमों के खिलाफ निरंतर दुश्मनी वाले एजेंडे को ना चलाते, आपके नेता ज़हरीले भाषण ना देते, मुस्लिमों को बहुसंख्यकों के दुश्मनों जैसा चित्रण ना करते तो सम्भव ही नहीं था कि भारत में कोई आपके या किसी और पार्टी के खिलाफ अदावत या डर का माहौल बना कर मुस्लिमों की वोट बैंक की राजनीति करने में सफल होता।

निश्चित ही हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि सारी ही पार्टियों ने मुस्लिम और इस्लाम को केंद्र बनाकर राजनीति की और यह इसलिये भी की विकास और असल मुद्दों की राजनीति मुश्किल होती है। जवाब देना पड़ता है। लेकिन धर्म की राजनीति बड़ी आसान होती है। काम करना नहीं होता और लोग आपस में ही उलझे रहते हैं अपनी बदहाली को अपनी क़िस्मत का, दूसरे वर्ग का दोष समझ कर ज़िंदगी गुज़ार देते हैं ना ही कोई सवाल करते हैं।

और बड़े अफ़सोस की बात है कि अब तक जो धर्म की राजनीति मुस्लिमों को केन्द्र बना कर की गई अब वह ही बहुसंख्यकों को केन्द्र बना कर की जा रही है और इसमें पूरे देश का नुक़सान होता है लेकिन ज़्यादा उसका होता है जिसे केंद्र बनाया जाता है। मुस्लिमों का उदाहरण सबके सामने है। बहुसंख्यकों` का अब नुकसान कैसे हो रहा है वह अब महसूस किया जाने लगा है। कहने की ज़रूरत नहीं सारे देश मे लोग परेशान है काम, धन्धे ठप हैं, महामारी कंट्रोल नहीं हो पा रही फिर भी चुनावी रैलियां हो रही हैं और जनता है कि अपनी बर्बादी छोड़ धर्म-धर्म करने में लगी है। इसे ही धर्म की राजनीति (Communal politics) कहा जाता है।

आश्चर्य की बात है कि यह जो हो रहा है यह है तो धर्म की राजनीति, लेकिन इसे नाम दिया जा रहा है सेक्युलर राजनीति का। समझने वाले ही समझ सकते हैं कि इसे अफ़साना (Narrative) बनाने की कला में अगला शब्द है “सेक्युलर” । सेक्युलर मतलब तो यह होता है कि राजनीति में धर्म का दखल ना हो जबकि इसके उलट पूरी राजनीति ही धर्म पर हो रही है और गालियाँ और दोष सेक्युलर शब्द को दिया जा रहा है।

खैर आगे सुधांशु जी ने बहुत अहम बात कबूल की जिसे आगे से सभी को ध्यान रखना चाहिए। वह यह कि आज़ादी के बाद सिर्फ़ मुस्लिमों की रियासतें थी और वे बहुत धनवान थे।

 

अब ये बताएँ की जब मुस्लिमों की इतनी रियासत और सम्पत्ति थी औऱ आज वे आर्थिक रूप से इतने कमज़ोर हो गए तो या तो:-

  • 1. उनकी सम्पत्तियों का गबन किया गया उन्हें लूटा गया।

अगर ऐसा है तो निश्चित ही वे मज़लूम हुए और उनको व्यवस्थित (सिस्टमैटिक) ढंग से लूटने वाले पूर्ण दोषी।

 

  • 2. या फिर उन्होंने ख़ुद ने ही अपनी सम्पत्ति लुटा दी।

और अगर ऐसा है तो इसका मतलब हुआ कि उनकी सम्पत्ति दूसरों के पास खिसक (Shift) गई। तरीक़ा कुछ भी रहा हो इसका मतलब यह हुआ कि देश की सम्पत्ति और दूसरों की सम्पत्ति बढ़ने में मुस्लिमों की ही सम्पत्ति ही ज़िम्मेदार रही। अतः यह झूठ फ़ैलाना बन्द कर देना चाहिए कि बहुसंख्यकों ने मुस्लिमों पर ख़र्च किया वगैरह क्योंकि इसका उलटा साबित होता है वह भी आज आपके ख़ुद के शब्दों में। साथ ही आईटी सेल (I.T. cell) के जरिये ब्रेन वाशिंग के उन मैसेजों को चलाना बन्द करना चाहिए जो सीधे (direct) या परोक्ष (indirectly) दिन भर यह झूठा बखान (narrative) लोगो के मन मे बैठाने की कोशिश करते हैं, वह भी जब आज भी ताज महल, लाल किले और ऐसी कई धरोहरों से देश को सालाना अरबों रुपए की कमाई होती है।

 

खैर यह तो हुई इतिहास की बात, आप अगर वाकई में मुस्लिमों के हितैषी हैं तो आज की स्थिति में ही देश भर में जो मुस्लिमों की वक़्फ बोर्ड की ज़मीन है उसके ज़रिए आम मुस्लिमों को फायदा सुनिश्चित करें, देश भर में जो मुस्लिमों के शिक्षा (Education) का ढाँचा है जामिया इस्लामिया आदि उन्हें सुचारू करें। क्यों कुछ लोगों की मिली भगत से वहाँ सिर्फ़ तनख्वाह बट रही हैं लेकिन स्कूल बंद पड़े हैं। कई सारी प्रस्तावित रिपोर्टों को लागू करें जिनमें कारण बताया गया है कि क्यों मुस्लिम पिछड़ रहे हैं और उनके उत्थान के लिये क्या करना होगा।

 

कुछ तो दोहरे मापदंड है जिन्हें आपको बदलना होंगे। आप बात करते हैं सिखों और दूसरी अल्पसंख्यक (माइनॉरिटी) की। आप ख़ुद देख लें उनकी राजनीति और प्रमुख पदों में कितनी उपस्थिति है? जबकि मुस्लिमों की बात करें तो यदि कोई गलती से भी मुस्लिम पार्टी खड़ी हो भी जाए तो आप उसे देश विरोधी पार्टी, कट्टर मुस्लिम नेता का तमगा लगा देते है। कोई पार्टी किसी मुस्लिम का नामांकन कर भी दे तो उसे मुसलिम प्रेमी पार्टी बताकर ध्रुवीकरण चालू कर देते हैं, लेकिन क्या अपने कभी ऐसा जैनियों के साथ किया ?

 

यह तो न्याय नहीं है। अगर वाकई आप मुस्लिमों के प्रति ईमानदार है तो आपको उन्हें इस तरह के दोहरे मापदंड छोड़ हर जगह मौके और स्वीकार्यता देनी होगी।

और भी कई बातें है जो आप मुस्लिम विरोध की राजनीति करने की बजाय कर सकते हैं यदि आप वाकई में सही राजनीति करना चाहते हो तो । क्योंकि इतिहास गवाह है कि जब भी कहीं धर्म नहीं बल्कि विकास मुद्दा बना और इस हेतु कोई भी मोर्चा आगे आया हो मुस्लिमों ने तथाकथित धार्मिक मुद्दों को छोड़ कर उनका ही साथ दिया है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि जहाँ कहीं चुनाव होता है आप पहले कमर कस कर उस प्रदेश में धार्मिक राजनीति की लहर बनाने में लग जाते हैं। कभी-कभी तो यह विचार आता है कि यदि इस देश में मुस्लिम ना होते तो फिर यहाँ चुनाव किस मुद्दे पर लड़े जाते? शायद चुनाव होते हीं नहीं, क्योंकि आजकल बताया यह जा रहा है सेक्युलर तो बुरा है। कुछ समय बाद बताया जाएगा कि तानाशाही या एक पार्टी (One party) शासन सही है।

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