अगर इस्लाम शांति का मज़हब है तो आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने "बनु क़ुरैज़ा" के लोगों को क़त्ल करने का फैसला क्यों दिया? इसी तरह कअब बिन अशरफ को क्यों क़त्ल किया गया? वह तो सिर्फ एक शायर था।

शांति का मज़हब होने का मतलब यह नहीं है कि अपराधियों और दुष्टों को सज़ा ना दी जाए बल्कि शान्ति क़ायम रखने के किए अपराधियों को सज़ा देना ज़रूरी है। बनु क़ुरैज़ा के मर्दों को देशद्रोह, विश्वासघात और मदीना के तमाम मुसलमानों के क़त्ल की साज़िश के जुर्म में क़त्ल की सज़ा दी गई थी।

संक्षेप में मामला यह था :-

जब नबी सल्लल्लाहू अलैहि व सल्लम मुसलमानों के साथ मक्का के गैर मुस्लिमों के ज़ुल्म और सितम से मजबूर होकर मदीना वालो के आमंत्रण पर मक्का से मदीना तशरीफ़ ले गए तब मदीना के लोगों ने मुसलमानों का इस्तकबाल किया, नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के मदीना पहुँचने पर वहाँ मौजूद मदीने के मुस्लिम कबीलों और मक्का के मुस्लिमो में भाईचारा क़ायम हो गया वहाँ के मुस्लिम कबीले जिनमे इस्लाम आने से पूर्व मतभेद थे वे सभी दूर हो गए।

उस समय कोई मुल्की या मिलिट्री निज़ाम तो नहीं हुआ करता था और सभी की सुरक्षा एक बड़ी फिक्र थी। उस वक्त मदीना में मुस्लिमो के अलावा तीन यहूदी कबीले भी मौजूद थे। नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उनके साथ भी समझौते किये और सभी ने मिलकर आपस में संधि (Alliance) की कि सब मिलकर मदीना की हिफाज़त करेंगे। तुम्हारा दुश्मन हमारा दुश्मन होगा और हम तुम्हारी तुम्हारे दुश्मनों के खिलाफ मदद करेंगे और हमारा दुश्मन तुम्हारा दुश्मन होगा और तुम्हें हमारी हमारे दुश्मनों के खिलाफ मदद करना होगी। इसके अलावा भी कई समझौते हुए।

 

उन सभी समझौते का मुसलमानों ने बड़ी दृढ़ता से पालन किया। मगर इसके उलट यहूदियों ने हमेशा मदीने की हुक़ूमत के साथ गद्दारी की और दुश्मनों का ही साथ दिया।

 

जैसे मक्का के दुश्मनों ने जब पहली बार मुसलमानों पर हमला किया उस समय यहूदियों के एक कबीले ने मुसलमानों के साथ गद्दारी की और दुश्मनों का साथ दिया। यह इतना बड़ा जुर्म था कि उन के हर व्यक्ति को फाँसी की सजा मिलनी चाहिए थी मगर नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उनको माफ़ कर दिया और जिला वतन कर दिया। दूसरी लड़ाई के बाद यहूदियों के दूसरे कबीले ने गद्दारी की इस बार भी आपने उन्हें माफ़ करके जिला वतन कर दिया।

 

लेकिन इसके बाद जब गजवा-ए-खंदक हुआ और मक्का के दुश्मनों के साथ अरब के और भी बहुत सारे कबीले मुसलमानों पर हमला करने के लिए मदीना आए तो मुसलमानों ने उनसे बचने के लिए मदीना के आसपास खंदक (गहरी खाई) खोदी। यह एक बहुत ही बड़ा हमला था और उस वक्त मुसलमानों की संख्या दुश्मन के मुकाबले में बहुत थोड़ी थी। मदीना के हालात भी बहुत सख़्त थे और हर व्यक्ति की जान पर पड़ी थी। ऐसे नाज़ुक वक्त में बनु क़ुरैज़ा के यहूदियों ने दुश्मनों के साथ ना सिर्फ हाथ मिलाया और मुसलमानों की पीठ में खंज़र घोंपने का काम किया बल्कि तमाम षडयंत्रों के साथ तमाम मुस्लिमो का कत्ले के आम हो जाने का पूरा मंसूबा बनाया जैसे ना केवल वे दुश्मनों की मदद करेंगे बल्कि जब वे बाहर से हमलावर होंगे तो यह अंदर से घात करेंगे ताकि मुसलमान दोनों तरफ से घिर जाए और उनके बचने की कोई शक्ल ना बचे। दुश्मनों के साथ मिलकर उन्होंने मुसलमानों पर हमले की साज़िश की। मगर अल्लाह तआला ने उनकी तमाम साजिशों को किसी तरह नाकाम कर दिया। इस भयानक साज़िश का इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि उस वक्त उन्होने डेढ़ हजार तलवारे, दो हजार भाले, 300 जिरह ( लोहे का सूट जिसे जंग में पहना जाता है) 500 ढालें मुसलमानों से लड़ने के लिए तैयार कर रखी थी। जबकि चोला दोस्ती (Alliance) का पहन रखा था ।

 

इसको आप यूँ समझे कि भारत के चाइना से अगर लड़ाई चल रही हो और भारत के किसी शहर के लोग चाइना की मदद करते हुए पीछे से भारतीय फौज पर हमला करें दुश्मनों से मिलकर उन्हें ख़त्म करने की साज़िश करे तो उन्हें क्या सज़ा मिलना चाहिए? क्या उन्हें फाँसी और क़त्ल से बढ़कर सजा नहीं मिलनी चाहिए?

 

आज भी किसी भी देश के कानून में सिर्फ देशद्रोह करना या दुश्मन से गुप्त सूचना साझा करना ही मौत की सज़ा की श्रेणी में आता है। तो अगर कोई इस से भी बढ़कर सूचना साझा करना तो छोड़िए बल्कि दुश्मन से मिलकर विश्वासघात करे, पीठ पीछे हमले की साज़िश करे अपने लोगों की मृत्यु सुनिश्चित करे तो उसकी क्या सज़ा होना चाहिए ?

 

यही काम बनु क़ुरैज़ा वालों ने भी किया। इसलिए बनु क़ुरैज़ा के सभी बालिग मर्दों को क़त्ल की सज़ा दी गई।

 

और ऐसा भी नहीं है कि वे इस सज़ा से अंजान थे बल्कि अपना अपराध और उसकी सज़ा से वे भली भांति परिचित थे। तभी इस संदर्भ में जब मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपराधियों से पूछा कि क्या इस मामले में तुम्हें सा’द इब्ने मुआज़ का फैसला कबूल होगा? (सा’द इब्ने मुआज़ जो की यहूदियों के ख़ास मित्र कबीले औस के सरदार थे) तो सभी ने कहा हाँ हमे कबुल होगा।

 

तब सा’द इब्ने मुआज़ ने उन्हें क़त्ल का फैसला सुनाया जिसे उन्होंने कबूल किया क्योंकि इस संगीन जुर्म की सज़ा यही है और यह ख़ुद यहूदियों की किताब Deuteronomy 20: 12 में भी दर्ज है और आज भी किसी भी देश के कानून में इसकी यही सज़ा होगी। इसे मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की भी स्वीकृति मिली।

 

इस घटना / वाकिये से नबी सल्लल्लाहो अलैहि व सल्लम के इंतिहाई रहम दिल और दयालु होने का भी पता चलता है। क्योंकि जब यहूदियों ने पहली बार गद्दारी की थी तो आप जानते थे कि अगर इनको इसी तरह खुला छोड़ दिया तो यह हमारे खिलाफ दोबारा साज़िश करने लगेंगे। लेकिन फिर भी उन्होंने उन्हें माफ़ किया और सज़ा-ए-मौत के बजाए सिर्फ जिला वतन किया। यही उन्होंने दूसरी बार भी किया। मगर बनु क़ुरैज़ा ने इस से ना कोई नसीहत हासिल की ना स्वयं को सुधारा बल्कि उल्टा वे तो अपनी साज़िश और षड्यंत्र में और आगे बढ़ गए अतः उनका जुर्म भी बहुत ज़्यादा बड़ा और जान बूझ के किया हुआ था। इसलिए उन्हें मौत की सज़ा दी गई।

 

उसी तरह *कअब बिन अशरफ* भी एक अपराधी था। शायर होने का ये मतलब नहीं की वह कोई मोतबर शख्सियत था। जिस तरह से कुछ डॉक्टर, इंजीनियर भी अपराधी होते हैं और अपने पेशे का ही इस्तेमाल अपराध में कर देते हैं। उसी तरह कअब बिन अशरफ भी जंग भड़काने, लोगों को उकसाने और फितना करने में अपने पेशे का इस्तेमाल करता था। कई जंगे भड़काने और कई लोगों की मौत का ज़िम्मेदार था। उसके औऱ भी कई जुर्म थे जैसे जंग-ए-बदर के बाद मक्का वालो को फिर मुस्लिमों के साथ जंग के लिए उकसाना, मदीना में आकर मुसलमानों को उनकी महिलाओं आदि के बारे में आहत करने वाली बातें करना निरन्तर मुस्लिमो को मानसिक और शारीरिक यातना देने की कोशिशें करते रहना यहाँ तक कि आप मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैही व सल्लम के क़त्ल की साज़िश में भी शामिल था।

 

अतः शांति स्थापित रखने के लिए यह ज़रूरी है कि अशांति फैलाने वाले फितना फसाद और जंग भड़काने वाले जघन्य अपराधियों को सख़्त सजा दी जाए ताकि दूसरों को भी नसीहत हो और तमाम फितना फसाद की कोशिश करने वाले अपनी हरकतों से बाज़ रहें। इसीलिए उसे भी उसके अपराध की सज़ा दी गई।

 

 

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