सवाल :-इस्लाम में लड़कियाँ जनाज़े को कंधा क्यों नहीं दे सकती?*

*जवाब:* वैसे तो औरत को जनाज़े में कंधा ना दिलाकर शारीरिक और मानसिक श्रम से बचाना ही तार्किक और अक्ल के करीब बात है, लेकिन फिर भी यहाँ सवाल होने पर चंद वजहें बताई जा रही हैं:-

 

(1) इस्लाम में औरतो को ऐसे कामो की ज़िम्मेदारी में नहीं डाला गया है जिसमे जिस्मानी कुव्वत (शारीरिक श्रम) की ज़्यादा ज़रूरत हो।

 

(2) इस्लाम औरतो की हिफाज़त के लिए अलग-अलग जिन्सों को अलग-अलग रखना (Segregation of sexes) यानी के औरत और मर्द के दरमियान शारीरिक दूरी का हुक्म देता है। यहाँ तक इस्लाम के अहम हिस्से नमाज़ में भी इसका ख़्याल रखा गया है कि औरत और आदमी कंधे से कंधा मिलाकर नमाज़ अदा नहीं करते। अगर औरत को कंधा देने में शामिल किया जाए तो वहाँ यह दूरी मुमकिन नहीं रहेगी। यह सर्वसम्मत है कि जहाँ भी भीड़ हो यह दूरी ख़त्म हो जाती है तब औरतो के लिए किसी अप्रिय घटना की संभावना बहुत अधिक होती है।

 

(3) औरतो में भावनात्मक पहलू बहुत अधिक होता है। औरत माँ का फ़र्ज़ अदा करती है इसलिए उनमें भावनात्मक लगाव, पीड़ा, किसी के दूर हो जाने का दु:ख / ग़म मर्दो के मुकाबले कहीं अधिक होता है। अगर उन्हें यह हुक्म दिया जाए कि वह अपने बाप, भाई या बेटे को कंधा दे और उसे कबर में दफनाए तो यह उन पर बहुत बड़ा ज़ुल्म होगा और उनके लिए भयँकर अवसाद का कारण होगा।

 

(4) इस्लाम में ऐसी कोई रस्म नहीं है कि कफ़न-दफन / अन्तिम संस्कार के वक़्त उसे बड़ा बेटा ही अदा करेगा और बेटा नहीं है तो बेटी नहीं कर सकती, जिससे किसी तरह के भेद भाव की शक्ल बने। बल्कि इस्लाम में यह काम तो कोई भी मुस्लिम कर सकता है। अतः जब इतने सारे मर्द मौजूद हैं तो फ़िर औरत पर ज़बरदस्ती यह ज़िम्मेदारी डालने की ना कोई ज़रूरत है और ना ही यह कोई समझदारी की बात है।

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